भारतीय राजनीति, जहां अक्सर शक्ति और वैभव का प्रदर्शन दिखाई देता है, वहां प्रताप चंद्र सारंगी अपनी विनम्रता, सेवा और सादगी के लिए जाने जाते हैं। बालासोर से सांसद और “ओडिशा के मोदी” के नाम से मशहूर सारंगी केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि समाज सेवा और मानवता के प्रति अटूट समर्पण का प्रतीक हैं। उनके जीवन की कहानी, जो ओडिशा के एक छोटे से गाँव से शुरू होकर संसद तक पहुंची है, प्रेरणादायक और दिल को छू लेने वाली है।

सादगी से भरा प्रारंभिक जीवन
4 जनवरी 1955 को ओडिशा के गोपीनाथपुर गाँव में जन्मे प्रताप सारंगी का बचपन साधारण परिस्थितियों में बीता। आर्थिक चुनौतियों के बावजूद, उन्होंने बचपन से ही आध्यात्म और समाज सेवा में गहरी रुचि दिखाई। जीवन के गहरे अर्थों को समझने की चाह में उन्होंने रामकृष्ण मठ में साधु बनने का सपना देखा। लेकिन, मठ के साधुओं ने उन्हें समाज सेवा की राह अपनाने का सुझाव दिया। इसके बाद, सारंगी ने अपने जीवन को शिक्षा और समाज के सबसे गरीब वर्ग की सेवा के लिए समर्पित कर दिया।
निस्वार्थ सेवा का जीवन
सारंगी के जीवन की सादगी उनके काम में झलकती है। एक छोटे से झोपड़ीनुमा घर में रहने वाले सारंगी आधुनिक जीवन की कई सुविधाओं से दूर रहते हैं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि नेतृत्व पद या ऐशो-आराम से नहीं, बल्कि सेवा से बनता है। उन्होंने आदिवासी और गरीब बच्चों के लिए दूरदराज के क्षेत्रों में स्कूल स्थापित किए, ताकि वे भी शिक्षा का लाभ उठा सकें।
राजनीतिक करियर: उम्मीद की किरण
सारंगी की मुख्यधारा की राजनीति में शुरुआत समाज सुधार की उनकी प्रतिबद्धता का स्वाभाविक विस्तार थी। 2004 और 2009 में उन्होंने ओडिशा विधानसभा चुनाव लड़ा और नीलगिरी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। लेकिन, 2019 में बालासोर से लोकसभा चुनाव जीतकर उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब उन्हें पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन, और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय में राज्यमंत्री के रूप में शामिल किया, तो यह न केवल ओडिशा, बल्कि उन सभी भारतीयों के लिए गर्व का क्षण था, जो राजनीति में सादगी और ईमानदारी को महत्व देते हैं।
चुनौतियां और दृढ़ता
प्रताप सारंगी की सबसे बड़ी खासियत है कि वह आम जनता से गहराई से जुड़े हुए हैं। उन्हें अक्सर साइकिल से यात्रा करते या पैदल चलते हुए अपने क्षेत्र के लोगों से मिलते देखा जा सकता है। उनके लिए नेतृत्व का मतलब शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि जनता की सेवा करना है। उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी और जनकल्याण के प्रति अटूट समर्पण ने उन्हें ओडिशा और देशभर में प्रिय बना दिया है।